सफर।


रफ्ता रफ्ता काट रहा था, लम्हो में जीते हुए (२),
अल्फाज़ो में बयान न होगा यह कारवां।
इन् मुस्क़ुरते हुए चेहरों को देखकर,
कौन कहेगा की मुकम्मल सफर न था।

तिनका तिनका चुन चुन के(२),
अपने कुछ सपनो को पिरोया है,
इन् रोशन जहान को देखकर,
कौन कहेगा की कश्मकश में सफर न था।

उलझी सुलझी राहों में (२),
तोड़ी देर और चलना है।
अकेले अब हमको देखकर,
कौन कहेगा की हमारा कोई हमसफ़र न था।

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